जबलपुर. नर्मदा की कल-कल धारा, संगमरममर की वादियां, लहलहाते खेत, जंगल और प्राकृतिक सौंदर्य यह सब मां नर्मदा की देन है. मां नर्मदा के तट पर बसे इस शहर को वर्तमान में जबलपुर के नाम से जाना जाता है, लेकिन इसे संस्काधानी का दर्जा भी दिया गया है.अंग्रेजों के समय में इसे जब्बलपोर कहा गया. फिर आजादी के बाद जबलपुर और जल्द ही इसे जाबालीपुरम के नाम से जाना जाएगा. जाबालीपुरम कोई नया नाम नहीं है बल्कि यह त्रेतायुग युग में राजा दशरथ के मंत्रिपरिषद के सदस्य रहे जाबालि ऋषि के नाम पर रखा गया था.
युग युगांतर में परिस्थितियां और संस्कृतियों में हुए बदलाव के चलते जाबालि ऋषि की तपोभूमि जबलपुर बन गई. लेकिन अब एक बार फिर इसे इसकी संस्कृति और उपनिषदों में वर्णित नाम से जाना जाएगा. इसके लिए जबलपुर नगर निगम की ओर से प्रस्ताव भेजा जा चुका है.
क्यों उठी नाम बदलने की मांग
जाबालि ऋषि की तपोभूमि होने के कारण जबलपुर का नाम बदलकर जाबालि पुरम रखने की मांग कई सालों से उठती रही है. दरअसल इसकी मुख्य वजह लोगों की भावनाएं और मान्यता है. कहा जाता है कि किसी भी शहर की बसाहट में वहां की प्रकृति और संस्कृति के साथ इतिहास की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है. जबलपुर के लिए यह सौभाग्य है कि यहां शिव पुत्री मां नर्मदा की धारा मिलती है. गोंड शासकों के इस क्षेत्र में श्रीराम के त्रेता युग से धर्म और संस्कृति की अमिट छाप बनी जो आज भी इतिहास के पन्नों में दर्ज है और ऐतिहासिक धरोहरों के रूप में दिखाई देती है. समय बदला और फिर मुगलों के बाद मराठा और फिर अंग्रेजों ने भी यहां शासन किया, लेकिन इसकी पहचान हमेशा महर्षि जाबालि के नाम से ही रही.
शहर की पहचान आध्यामिक क्षेत्र के साथ ही ऐतिहासिक क्षेत्र में भी महत्व रखती है. भेड़ाघाट क्षेत्र महर्षि भृगु का क्षेत्र था और फिर त्रिपुरी काल में उनका क्षेत्र भरूच तक था. उनके वंशज जमदग्नि और परशुराम थे. वे भी इस क्षेत्र में भ्रमण कर तपस्या करते थे. इनका क्षेत्र मालवा और गुजरात तक था. कार्तवीर्य अर्जुन के समय त्रिपुरी का चरमोत्कर्ष हुआ लेकिन भगवान परशुराम से युद्ध के उपरांत त्रिपुरी श्रीविहीन हो गई. वहीं महर्षि जाबालि का क्षेत्र सुतीक्ष्ण आश्रम सतना चित्रकूट से कुंडम, बघराजी, मंडला के पहले, पाटन, कटंगी और वर्तमान का जबलपुर क्षेत्र था, जो एक गोल घेरा की तरह बनता है. इस क्षेत्र को तब से जाबालिपुरम के नाम से लोग जानने लगे.
कांग्रेस ने उठाए सवाल
एक तरफ साधु संत और इतिहासकार जबलपुर को जाबालि पुरम के रूप में पहचान दिलाने का प्रयास कर रहे हैं तो वहीं कांग्रेस इस पर सवाल खड़े कर रही है. कांग्रेस नेता पंकज पांडे का कहना है कि सिर्फ नाम बदलने से क्या होगा. जबलपुर के लोग हमेशा से धर्म और संस्कृति से जुड़े रहे हैं, बल्कि नाम परिवर्तन के कारण सरकार और आम जनता का लाखों रुपए बर्बाद होगा. यह सब महापौर जगत बहादुर सिंह अन्नू सिर्फ इसलिए कर रहे हैं कि ताकि इतिहास में उनका भी नाम दर्ज हो जाएगा कि उन्होंने जबलपुर को उसकी ऐतिहासिक पहचान वापस दिलाई. बेहतर होगा कि जाबालि ऋषि

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